पांडव और बगड़वाल नृत्य जैसे सांस्कृतिक आयोजनों पर मंडराया डिजिटल साया

रुद्रप्रयाग,। कभी पहाड़ की सर्द रातों में धूणी (अलाव) के चारों ओर बैठकर बुजुर्गों से पांडवों की गाथाएं और बगड़वाल की वीरता के किस्से सुनना ग्रामीण जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। लेकिन आज पहाड़ के गांवों की वह जीवंत चर्चाएं और सामूहिक उल्लास धीरे-धीरे स्मार्टफोन की नीली रोशनी में गुम होता जा रहा है। जहां पहले चौपालों पर संस्कृति की पाठशाला लगती थी, वहां अब अधिकांश समय फोन की स्क्रीन के सहारे गुजर रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित होने वाले पांडव नृत्य, बगड़वाल नृत्य और जागर केवल मनोरंजन के साधन नहीं थे। ये एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक अपनी जड़ों, इतिहास और लोक मान्यताओं को हस्तांतरित करने के जीवंत माध्यम थे। नृत्य की हर मुद्रा और जागर की हर थाप में पूर्वजों का संघर्ष और देवतुल्य परंपराएं छिपी होती थीं। नई पीढ़ी इन आयोजनों को देखकर ही अनुशासन, सामूहिकता और अपनी पहचान को समझती थी।
एक दौर था जब धार्मिक आयोजनों की तैयारी और उनमें होने वाली चर्चाएं महीनों पहले शुरू हो जाती थीं। लोग एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करते थे। आज विडंबना यह है कि आयोजन के बीच में भी लोग ढोल-दमो की थाप का आनंद लेने के बजाय उसे मोबाइल में कैद कर सोशल मीडिया पर अपलोड करने में ज्यादा व्यस्त रहते हैं। पहले हम नृत्य के पात्रों की ऊर्जा और उनके समर्पण पर चर्चा करते थे, आज चर्चा इस बात पर होती है कि वीडियो पर कितने लाइक मिले। यह बदलाव हमारी जड़ों को कमजोर कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल युग ने सूचनाएं तो बढ़ाई हैं, लेकिन अनुभव कम कर दिए हैं। जब युवा पीढ़ी इन पारंपरिक नृत्यों और कथाओं से शारीरिक और मानसिक रूप से नहीं जुड़ती, तो लोक विधाओं का मौलिक स्वरूप खतरे में पड़ जाता है। यदि यही स्थिति रही, तो आने वाले समय में हमारी लोक विधाएं केवल संग्रहालयों या यूट्यूब की वीडियो लाइब्रेरी तक सीमित रह जाएंगी। आवश्यकता इस बात की है कि तकनीक का उपयोग संस्कृति के प्रचार के लिए तो हो, लेकिन वह हमारी जीवंत परंपराओं और आपसी संवाद की जगह न ले।
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