शिष्य को शवत्व से ‘शिवत्व’ तक ले जाते हैं ‘दिव्य गुरूदेव’ः जाह्नवी भारती

देहरादून, । बिना शिव के मानव देह को शव के समान बताया गया है। शिव की प्राप्ति के लिए दिव्य गुरू की आवश्यकता ठीक उसी प्रकार से है जिस प्रकार से शरीर के लिए श्वांसे आवश्यक हुआ करती हैं। दिव्य गुरू का शास्त्र सम्मत महामहिम पावन ‘ब्रह्मज्ञान’ ही वह शाश्वत सनातन दिव्य तकनीक है जो इस शिवविहीन शवत्व सरीखे शरीर को ‘शिवालय’ बना देता है। शिव ही तो वह परम कल्याणकारी शक्ति हैं जिनकी प्राप्ति के उपरान्त मानव जीवन को पूर्णता प्राप्त हो पाती है और जीवन सार्थक-सफल हो जाता है।
इन विचारों को आज साप्ताहिक रविवारीय सत्संग-प्रवचनों के मध्य ‘दिव्य गुरू आशुतोष महाराज’ की शिष्या तथा देहरादून आश्रम की प्रचारिका साध्वी विदुषी जाह्नवी भारती ने विपुल संख्या में उपस्थित भक्तों-साधकों के समक्ष उजागर किया। ‘दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान’ की देहरादून शाखा के तत्वाधान में इन सदविचारों को प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ भावभीने मधुर भजनों की अविरल प्रस्तुति देते हुए किया गया। मंचासीन संगीतज्ञों के गाए भजनों ने संगत को भाव-विभोर कर दिया।
भजनों में छुपे गूढ़ आध्यात्मिक तथ्यों की विवेचना करते हुए मंच का संचालन साध्वी विदुषी सुभाषा भारती जी के द्वारा किया गया। उन्होंने बताया कि मनुष्य जीवन में उसे अनेक प्रकार की दुर्लभ से दुर्लभतम उपलब्धि सहज ही हो सकती है। अगर कुछ अति दुर्लभ है तो वह है ईश्वर की तरफ निर्बाध गति से बढ़ाने वाले मार्ग का मिल जाना। यह उपलब्धि केवल मात्र मनुष्य के लिए ही निर्धारित की गई है। अन्य किसी भी योनि में इसका कोई प्रयोजन ही नहीं है। यहां तक की स्वर्ग के सर्वगुण सम्पन्न तथा सर्वसुखों को प्राप्त किए हुए देवी-देवताओं के लिए भी एक असम्भव कार्य है। साध्वी जी ने आगे कहा कि ईश्वर तक पहुंचा देने वाली ‘परमसत्ता’ को ही महादेव परम गुरू कहकर उनकी वंदना गाते हैं। करूणा की प्रतिमूर्ति परम गुरू सदा अपनी करूणा के वशीभूत होकर ही इस धराधाम पर अवतार धारण किया करते हैं। जन्मों-जन्मों से अनेकानेक योनियों में भटकते हुए और थपेड़े खाती हुई आत्माओं का तारण कर देने के लिए ही यह परम सत्ता हर युग में आती है। दया सिन्धु गुरूदेव अपने सनातन ब्रह्मज्ञान की शीतल छांव में अतृप्त आत्माओं को अनन्त-असीम शांति प्रदान कर उनके अंशी ईश्वर में उनका विलय कर दिया करते हैं। साध्वी जी ने कहा कि युगों-युगों से यह एक एैसा सच है जो कभी भी बदलता नहीं है। इसी पर श्री गुरूनानक साहिब जी क्या खूब कहते हैं- ‘आदि सच, जुगादि सच, है भी सच, नानक होसी भी सच।’ अपने सत्संग-प्रवचनों के बीच आगे साध्वी जाह्नवी भारती ने भक्तजनों के समक्ष अनेक प्रेरक शास्त्रीय दृष्टांतों को तो रेखांकित किया ही साथ ही उन्होंने ‘दिव्य गुरू आशुतोष महाराज’ से संबंधित उनके साधकों-भक्तों के अनेक दिव्य अनुभव भी सांझा किए। उन्होंने कहा कि गुरू का दिव्य संग है तो शिष्य का किया गया प्रत्येक कर्म भक्ति ही बन जाता है। गुरू जब जीवन में प्राप्त हो जाते हैं तब शिष्यात्मा के समक्ष उसकी मंजिल आकर खड़ी हो जाती है। गुरू और ईश्वर में कोई भेद नहीं है, यह बात हर शास्त्र-ग्रन्थ और प्रत्येक आध्यात्मिक इतिहास में दर्ज है। प्रसाद का वितरण करते हुए साप्ताहिक कार्यक्रम को विराम दिया गया।

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